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द्रोण पर्व
अध्याय १७२
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सञ्जय़ उवाच
ततः किलकिलाशव्दः शङ्खभेरीरवैः सह |  ३७   क
पाण्डवानां प्रहृष्टानां क्षणेन समजाय़त ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति