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द्रोण पर्व
अध्याय १७२
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सञ्जय़ उवाच
चिन्तय़ित्वा तु राजेन्द्र ध्यानशोकपराय़णः |  ४१   क
निःश्वसन्दीर्घमुष्णं च विमनाश्चाभवत्तदा ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति