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द्रोण पर्व
अध्याय १७२
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सञ्जय़ उवाच
उत्सहन्तेऽन्यथा कर्तुमेतदस्त्रं मय़ेरितम् |  ४८   क
तदिदं केवलं हत्वा युक्तामक्षौहिणीं ज्वलत् ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति