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द्रोण पर्व
अध्याय १७२
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व्यास उवाच
महान्तमेतमर्थं मां यं त्वं पृच्छसि विस्मय़ात् |  ५०   क
तत्प्रवक्ष्यामि ते सर्वं समाधाय़ मनः शृणु ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति