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द्रोण पर्व
अध्याय १७२
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व्यास उवाच
अथापरं तपस्तप्त्वा द्विस्ततोऽन्यत्पुनर्महत् |  ५४   क
द्यावापृथिव्योर्विवरं तेजसा समपूरय़त् ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति