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द्रोण पर्व
अध्याय १७२
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व्यास उवाच
शुभाङ्गदं नागय़ज्ञोपवीतिं; विश्वैर्गणैः शोभितं भूतसङ्घैः |  ६०   क
एकीभूतं तपसां संनिधानं; वय़ोतिगैः सुष्टुतमिष्टवाग्भिः ||  ६०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति