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द्रोण पर्व
अध्याय १७२
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व्यास उवाच
जलं दिवं खं क्षितिं चन्द्रसूर्यौ; तथा वाय़्वग्नी प्रतिमानं जगच्च |  ६१   क
नालं द्रष्टुं यमजं भिन्नवृत्ता; व्रह्मद्विषघ्नममृतस्य योनिम् ||  ६१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति