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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १७
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वैशम्पाय़न उवाच
यत्र त्रय़ोदश समा वने वन्येन जीवसि |  २१   क
न तदा त्वा पिता ज्येष्ठः पितृत्वेनाभिवीक्षते ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति