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द्रोण पर्व
अध्याय १७२
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व्यास उवाच
अद्भ्यः स्तोका यान्ति यथा पृथक्त्वं; ताभिश्चैक्यं सङ्क्षय़े यान्ति भूय़ः |  ६९   क
एवं विद्वान्प्रभवं चाप्ययं च; हित्वा भूतानां तत्र साय़ुज्यमेति ||  ६९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति