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द्रोण पर्व
अध्याय १७२
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धृतराष्ट्र उवाच
आचार्यपुत्रो मानार्हो वलवांश्चापि सञ्जय़ |  ७   क
प्रीतिर्धनञ्जय़े चास्य प्रिय़श्चापि स वासवेः ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति