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द्रोण पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
ततो दश सहस्राणि न्यवर्तन्त धनुष्मताम् |  १८   क
मतिं कृत्वा रणे क्रुद्धा वीरा जय़पराजय़े ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति