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द्रोण पर्व
अध्याय १७२
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नीलकण्ठ उवाच
न सुपर्णास्तथा नागा न च विश्वे विय़ोनिजाः |  ७६   क
न कश्चित्त्वां च देवोऽपि समरेषु विजेष्यति ||  ७६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति