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द्रोण पर्व
अध्याय २५
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सञ्जय़ उवाच
तस्य काय़ं विनिर्भिद्य ममज्ज धरणीतले |  १६   क
ततः पपात द्विरदो वज्राहत इवाचलः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति