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द्रोण पर्व
अध्याय १७२
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व्यास उवाच
सर्वभूतभवं ज्ञात्वा लिङ्गेऽर्चय़ति यः प्रभुम् |  ९०   क
तस्मिन्नभ्यधिकां प्रीतिं करोति वृषभध्वजः ||  ९०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति