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द्रोण पर्व
अध्याय १७२
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सञ्जय़ उवाच
हृष्टलोमा च वश्यात्मा नमस्कृत्य महर्षय़े |  ९२   क
वरूथिनीमभिप्रेत्य अवहारमकारय़त् ||  ९२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति