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वन पर्व
अध्याय २३८
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दुर्योधन उवाच
यत्त्वद्य मे व्यवसितं तच्छृणुध्वं नरर्षभाः |  १०   क
इह प्राय़मुपासिष्ये यूय़ं व्रजत वै गृहान् |  १०   ख
भ्रातरश्चैव मे सर्वे प्रय़ान्त्वद्य पुरं प्रति ||  १०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति