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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
यथा वदसि राजेन्द्र सर्वमेतत्तथा विभो |  १४   क
नात्र मिथ्या वचः किञ्चित्सुहृत्त्वं नः परस्परम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति