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शान्ति पर्व
अध्याय १७३
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भीष्म उवाच
प्रज्ञय़ा प्रापितार्थो हि वलिरैश्वर्यसङ्क्षय़े |  ३   क
प्रह्रादो नमुचिर्मङ्किस्तस्याः किं विद्यते परम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति