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शान्ति पर्व
अध्याय १७३
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भीष्म उवाच
अपि जातु तथा तत्स्यादहोरात्रशतैरपि |  ४८   क
यदहं मानुषीं योनिं सृगालः प्राप्नुय़ां पुनः ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति