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वन पर्व
अध्याय १७३
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वैशम्पाय़न उवाच
सुय़ोधनाय़ानुचरैर्वृताय़; ततो महीमाहर धर्मराज |  ११   क
स्वर्गोपमं शैलमिमं चरद्भिः; शक्यो विहन्तुं नरदेव शोकः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति