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शान्ति पर्व
अध्याय २०४
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गुरुरु उवाच
अभिद्रवत्ययस्कान्तमय़ो निश्चेतनावुभौ |  ३   क
स्वभावहेतुजा भावा यद्वदन्यदपीदृशम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति