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वन पर्व
अध्याय १७३
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वैशम्पाय़न उवाच
तेजस्तवोग्रं न सहेत राज; न्समेत्य साक्षादपि वज्रपाणिः |  १४   क
न हि व्यथां जातु करिष्यतस्तौ; समेत्य देवैरपि धर्मराज ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति