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वन पर्व
अध्याय १७३
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वैशम्पाय़न उवाच
त्वदर्थसिद्ध्यर्थमभिप्रवृत्तौ; सुपर्णकेतुश्च शिनेश्च नप्ता |  १५   क
यथैव कृष्णोऽप्रतिमो वलेन; तथैव राजन्स शिनिप्रवीरः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति