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वन पर्व
अध्याय १७३
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वैशम्पाय़न उवाच
आमन्त्र्य वेश्मानि नदीः सरांसि; सर्वाणि रक्षांसि च धर्मराजः |  १८   क
यथागतं मार्गमवेक्षमाणः; पुनर्गिरिं चैव निरीक्षमाणः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति