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वन पर्व
अध्याय १८०
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वैशम्पाय़न उवाच
स पूजय़ित्वा मधुहा यथाव; त्पार्थांश्च कृष्णां च पुरोहितं च |  १५   क
उवाच राजानमभिप्रशंस; न्युधिष्ठिरं तत्र सहोपविश्य ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति