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वन पर्व
अध्याय १७३
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वैशम्पाय़न उवाच
तान्प्रस्थितान्प्रीतिमना महर्षिः; पितेव पुत्राननुशिष्य सर्वान् |  २१   क
स लोमशः प्रीतमना जगाम; दिवौकसां पुण्यतमं निवासम् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति