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अनुशासन पर्व
अध्याय १४३
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भीष्म उवाच
स एकदा कक्षगतो महात्मा; तृप्तो विभुः खाण्डवे धूमकेतुः |  २३   क
स राक्षसानुरगांश्चावजित्य; सर्वत्रगः सर्वमग्नौ जुहोति ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति