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वन पर्व
अध्याय १७३
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वैशम्पाय़न उवाच
समेत्य पार्थेन यथैकरात्र; मूषुः समास्तत्र तदा चतस्रः |  ५   क
पूर्वाश्च षट्ता दश पाण्डवानां; शिवा वभूवुर्वसतां वनेषु ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति