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वन पर्व
अध्याय १७३
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वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽव्रवीद्वाय़ुसुतस्तरस्वी; जिष्णुश्च राजानमुपोपविश्य |  ६   क
यमौ च वीरौ सुरराजकल्पा; वेकान्तमास्थाय़ हितं प्रिय़ं च ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति