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द्रोण पर्व
अध्याय १७३
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धृतराष्ट्र उवाच
तस्मिन्नतिरथे द्रोणे निहते तत्र सञ्जय़ |  १   क
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वन्नतः परम् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति