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अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
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वृहस्पतिरु उवाच
छागस्तु निधनं प्राप्य पूर्णे संवत्सरे ततः |  ६१   क
कीटः सञ्जाय़ते जन्तुस्ततो जाय़ति मानुषः ||  ६१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति