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शान्ति पर्व
अध्याय १६७
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भीष्म उवाच
एष धर्मभृतां श्रेष्ठ प्रोक्तः पापो मय़ा तव |  २३   क
मित्रद्रोही कृतघ्नो वै किं भूय़ः श्रोतुमिच्छसि ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति