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वन पर्व
अध्याय १८७
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देव उवाच
ऋग्वेदः सामवेदश्च यजुर्वेदोऽप्यथर्वणः |  १४   क
मत्तः प्रादुर्भवन्त्येते मामेव प्रविशन्ति च ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति