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द्रोण पर्व
अध्याय १७३
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व्यास उवाच
गन्धेनापि हि सङ्ग्रामे तस्य क्रुद्धस्य शत्रवः |  १७   क
विसञ्ज्ञा हतभूय़िष्ठा वेपन्ति च पतन्ति च ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति