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द्रोण पर्व
अध्याय १७३
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व्यास उवाच
काम्याय़ हरिनेत्राय़ स्थाणवे पुरुषाय़ च |  २२   क
हरिकेशाय़ मुण्डाय़ कृशाय़ोत्तरणाय़ च ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति