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द्रोण पर्व
अध्याय १७३
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व्यास उवाच
उष्णीषिणे सुवक्त्राय़ सहस्राक्षाय़ मीढुषे |  २४   क
गिरिशाय़ प्रशान्ताय़ पतय़े चीरवाससे ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति