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द्रोण पर्व
अध्याय १७३
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व्यास उवाच
महोदरं महाकाय़ं द्वीपिचर्मनिवासिनम् |  ३२   क
लोकेशं वरदं मुण्डं व्रह्मण्यं व्राह्मणप्रिय़म् ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति