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द्रोण पर्व
अध्याय १७३
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व्यास उवाच
विव्याध कुपितो यज्ञं निर्भय़स्तु भवस्तदा |  ४२   क
धनुषा वाणमुत्सृज्य सघोषं विननाद च ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति