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द्रोण पर्व
अध्याय १६५
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सञ्जय़ उवाच
वय़मेव तदाद्राक्ष्म पञ्च मानुषय़ोनय़ः |  ४२   क
योगय़ुक्तं महात्मानं गच्छन्तं परमां गतिम् ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति