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द्रोण पर्व
अध्याय १७३
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सञ्जय़ उवाच
न पद्भ्यां स्पृशते भूमिं न च शूलं विमुञ्चति |  ६   क
शूलाच्छूलसहस्राणि निष्पेतुस्तस्य तेजसा ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति