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वन पर्व
अध्याय १०५
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लोमश उवाच
प्रतिगृह्य तु सन्देशं ततस्ते सगरात्मजाः |  १८   क
भूय़ एव महीं कृत्स्नां विचेतुमुपचक्रमुः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति