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द्रोण पर्व
अध्याय १७३
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व्यास उवाच
नामधेय़ानि लोकेषु वहून्यत्र यथार्थवत् |  ७८   क
निरुच्यन्ते महत्त्वाच्च विभुत्वात्कर्मभिस्तथा ||  ७८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति