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आदि पर्व
अध्याय २०५
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वैशम्पाय़न उवाच
वर्तमानेषु धर्मेण पाण्डवेषु महात्मसु |  ४   क
व्यवर्धन्कुरवः सर्वे हीनदोषाः सुखान्विताः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति