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द्रोण पर्व
अध्याय १७३
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व्यास उवाच
एकाक्षो जाज्वलन्नास्ते सर्वतोक्षिमय़ोऽपि वा |  ८७   क
क्रोधाद्यश्चाविशल्लोकांस्तस्माच्छर्व इति स्मृतः ||  ८७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति