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द्रोण पर्व
अध्याय १७३
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व्यास उवाच
धूम्रं रूपं च यत्तस्य धूर्जटिस्तेन उच्यते |  ८८   क
विश्वे देवाश्च यत्तस्मिन्विश्वरूपस्ततः स्मृतः ||  ८८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति