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वन पर्व
अध्याय २७५
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मार्कण्डेय़ उवाच
सदेवासुरगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः |  ४८   क
कथय़िष्यन्ति लोकास्त्वां यावद्भूमिर्धरिष्यति ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति