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सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
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सञ्जय़ उवाच
एवंविधा हि सा रात्रिः सोमकानां जनक्षय़े |  १४२   क
प्रसुप्तानां प्रमत्तानामासीत्सुभृशदारुणा ||  १४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति