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वन पर्व
अध्याय २१२
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मार्कण्डेय़ उवाच
अद्भुतस्य तु माहात्म्यं यथा वेदेषु कीर्तितम् |  २८   क
तादृशं विद्धि सर्वेषामेको ह्येष हुताशनः ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति