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वन पर्व
अध्याय १७४
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः क्रमेणोपय़युर्नृवीरा; यथागतेनैव पथा समग्राः |  ११   क
विहृत्य मासं सुखिनो वदर्यां; किरातराज्ञो विषय़ं सुवाहोः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति