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वन पर्व
अध्याय १७४
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वैशम्पाय़न उवाच
चीनांस्तुखारान्दरदान्सदार्वा; न्देशान्कुणिन्दस्य च भूरिरत्नान् |  १२   क
अतीत्य दुर्गं हिमवत्प्रदेशं; पुरं सुवाहोर्ददृशुर्नृवीराः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति