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वन पर्व
अध्याय १७४
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वैशम्पाय़न उवाच
वराहनानामृगपक्षिजुष्टं; महद्वनं चैत्ररथप्रकाशम् |  १७   क
शिवेन यात्वा मृगय़ाप्रधानाः; संवत्सरं तत्र वने विजह्रुः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति